Saturday, 12 September 2015

सशक्त भारतीय नारी : एक सार्थक पहल



महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं को शक्ति संपन्न बनाना अर्थात किसी कार्य को करने का या रोकने की क्षमता को विकसित करना | महिलाओं की समाज में स्थिति क्या है उनकी शिक्षा का स्तर क्या है राजनैतिक कार्यों में निर्णय लेने में उनकी हैसियत क्या है क्या महिलाये भयमुक्त है ? आदि प्रश्न के उत्तर को नजरंदाज कर हम यूरोपीय देशो के नक़्शे कदम पर चल कर जाने अनजाने उनके ही जैसे महिला सशक्तिकरण की मांग कर रहे है | आज तक यह माना जाता रहा है की पुरुष आजाद रहे है एवं नारी के चारो और आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक ताना बना सदियों से एसा बुना गया जिसमे नारी का स्वयं का अस्तित्व नगण्य दिखाई देता है |

 फैशन पत्रिका ‘वोग’ द्वारा बनाया गया दो मिनट का एक वीडियो ‘माय च्वाइस’ जिसमे अभिनेत्री दीपिका पादुकोन के आलावा और 98 महिला वर्ग द्वारा अभिनीत किया गया है जिसमे यह जताने की कोशिश की गयी है की हम महिलाये कही भी जाने आने के लिए ,कैसे भी कपडे पहनने के लिए एवं शादी से पहले या शादी के बाद किसी के भी साथ सम्बन्ध बनाने के लिए स्वतंत्र है और ये माय च्वाइस है यानि मेरी मर्जी |तत्पश्चात एक पुरुष वीडियो आया जिसका सन्देश यह था कि हमें स्त्री एवं पुरुष दोनों की मर्जी का सम्मान करना चाहिए | यह सही है की स्त्री के सदियों से सिर्फ कर्तव्य रहे है अधिकार नहीं |परिवार में मर्द एवं औरत एक साथ रहते हुए भी भेदभावपूर्ण वातावरण से युक्त है | यह सच है की स्त्रियाँ जिस सम्मान की जिस सामाजिक संवेदना की हकदार है वह इक्कीसवीं सदी के एक दशक बीत जाने पर भी नहीं मिला है, और यह भी सही है की उनकी राह के रोड़ा उनके अपने ही लोग है कभी खानदान की खातिर कभी स्व स्वार्थ की पूर्ती हेतु महिलाओं को बलिबेदी पर चढ़ाना आज भी जारी है |परन्तु इसका यह अर्थ कदापि यह नहीं लगाया जाना चाहिए की महिलायों के लिए परिवार नामक संस्था से जुड़ना ही उनकी प्रगति का बाधक है |विदेशों में नारी उच्च शिक्षा प्राप्त कर मुक्त जिन्दगी जीती है रिश्ते बिना नाम के होते है संबंधो की कडि+यां इतनी कमजोर की तनिक भी बर्दाश्त की क्षमता नही और पति पत्नी का तलाक कब हो जाये कहा नहीं जा सकता |परन्तु सच तो यह है की हम भारतीय भी इस प्रकार के जीवनयापन को महिला सशक्तिकरण मान लेते है और पाश्चात्य देशों के पदचिन्हों पर चलने लगते है पर यह भूल जाते है की हमारे देश में महिलाओं का इतना गौरवशाली इतिहास रहा है |भारतीय नारी की सहनशीलता की मिसाल सीता एवं सावित्री है शक्ति की मिसाल दुर्गा तो वक्चातुर्यता एवं द्दढता में द्रौपदी की मिसाल पूरे विश्व में अन्यत्र नहीं है |

महिलाओं में क्षमता और उर्जा की कमी नहीं है, बस आवश्यकता है सही अवसर की | प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन की आवश्यकता है साथ ही आवश्यकता है महिलाओं को शिक्षित करने की जैसे – जैसे महिलाएं शिक्षित होंगी, वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक   होंगी | शिक्षा उनके आत्मविश्वास व कार्यकुशलता को बढ़ाएगी स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी निश्चित ही उनके भावी राजनैतिक जीवन का प्रारंभिक चरण सिद्ध होगी, इस अनुभव के आधार पर वे भविष्य में देश के नीतिगत फैसलों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकेगी |    


 पश्चिम से आयातित और भी कुछ नयी अवधारणायें आयी है जैसे “लिव टुगेदर” एवं आस्थाई विवाह | इस प्रकार की परिस्थितियों में स्त्री समाज में अपनी कैसे एवं क्या पहचान बनाये यह एक चुनौती है |आस्थाई विवाह अर्थात जैसे नारी को बाजार से खरीद कर विवाह कर लिया गया हो | तत्पश्चात विवाह सफल ना होने पर त्यागी गयी नारी का जीवन कितना कष्टदायक होगा इसकी सहज कल्पना की जा सकती है | पश्चिम से आयी अच्छी बातों को हमें जरूर ग्रहण करना चाहिए परन्तु महिला सशक्तिकरण के नाम पर वहां की अंध नक़ल करना और कूड़े को ताज समझ कर सजा लेना यह भारतीय परिवेश एवं भारतीय महिलाओं की आजादी का गलत आंकलन होगा |औरतों की आवाज पुरुषों की निरंकुशता के खिलाफ होना चाहिए यह नहीं कि महिलाये भी निरंकुश होंगी तभी बात बनेगी |यदि पुरुष लंपटता करता है तो उसकी सरेआम पिटाई की बात यदि हम औरते करते है तब उसी लम्पटता को महिलाओं के लिए सही क्यों मान लेना चाहिए |भारतीय संस्कृति को मातृशक्ति के रूप में पूजे जाने की जो परंपरा रही है उसका निर्वहन तभी संभव है जब स्त्री एवं पुरुष एक दुसरे के साथ मर्यादित आचरण करें |